अगर आप भी अपने प्रेमी या प्रेमिका के संग कोर्ट में लव मैरिज करके घर बसाने की सोच रहे हैं, लेकिन आप कोर्ट मैरिज के लिए बनाए गए स्पेशल मैरिज एक्ट 1954 और इससे जुड़ी प्रक्रिया के बारे में नहीं जानते हैं, तो यह लेख बस आपके लिए है, क्योंकि इस बार “कुछ सीखे” के लेख में हम आपको लव मैरिज के सरकारी नियम और उसे संबंधित जानकारी बताने जा रहे हैं।

 स्पेशल मैरिज एक्ट 1954 इन इंडिया 

      हमारे भारत देश में अधिकतर शादी समान धर्म और जाति के लोगों के बीच होता है। कुछ युवा जाति धर्म से परे उठकर पारिवारिक फैसलों के खिलाफ जाकर केवल प्यार करने वाले साथी को महत्व देते हैं और तब ऐसी स्थिति में दो प्रेमी जोड़े इस स्पेशल मैरिज एक्ट 1954 अधिनियम के तहत लव मैरिज कर लेते हैं।

      स्पेशल मैरिज एक्ट 1954 इन इंडिया 9 अक्टूबर 1954 में लागू किया गया है। इस एक्ट के तहत कानूनी अधिकार के अंतर्गत भारतीय न्यायपालिका किसी भी धर्म और जाति के लड़के और लड़कियों को लव मैरिज करने के लिए अनुमति देता है, जो अपनी इच्छा अनुसार एक दूसरे के साथ जीवन यापन करने के लिए तैयार हो। इस एक्ट को हिंदी में विशेष विवाह अधिनियम कहा जाता है।  इस एक्ट के अंतर्गत किए जाने वाले लव मैरिज के सरकारी नियम व प्रावधान :

  • भारत के सभी अंतरधार्मिक व अंतर्जातीय विवाह को मान्यता  मान्यता प्रदान करना।
  • किसी भी धार्मिक नीति के पालन की आवश्यकता नहीं होगी।
  • भारत का नागरिक होने के तहत दो व्यक्ति को शादी करने का अधिकार प्रदान करना।
  • दोनों पक्ष वयस्क हो और अपने फैसले लेने के लिए स्वतंत्र हो।
  • दोनों पक्षों में धर्म के अनुसार कोई रक्त संबंध नहीं होना चाहिए।
  • विवाह के दौरान दोनों पक्ष बालिक हो अर्थात महिला कम से कम 18 वर्ष और पुरुष कम से कम 21 वर्ष का होना चाहिए।

 लव मैरिज एक्ट के अंतर्गत आने वाली धाराएं :

       इस स्पेशल मैरिज एक्ट को लव मैरिज एक्ट के नाम से भी जाना जाता है। इसके अंतर्गत लव मैरिज करने वालों के लिए कुछ विशेष अनुसूची और धाराओं के तहत नियम बनाए गए हैं। लव मैरिज एक्ट में आने वाले कुछ विशेष अनुसूची और धाराओं  की जानकारी विस्तार से जाने :

      स्पेशल मैरिज एक्ट 1954 के कुल 5 अनुसूची और 51 धारा (सेक्शन) है। जिसमें 21(A), 27(A), 40(A), 40(B) और 40(C) भी शामिल है।

  • पहली अनुसूची = धारा 2 बी के अंतर्गत दोनों पक्षों के संबंध का उल्लेख।
  • दूसरी अनुसूची = धारा 5 के अंतर्गत इच्छित विवाह की सूचना।
  • तीसरी अनुसूची = धारा 11 के अंतर्गत दुल्हन और दूल्हे के द्वारा दी जाने वाली घोषणा पत्र।
  • चौथी अनुसूची =  धारा 13 के अंतर्गत विवाह का प्रमाण पत्र।
  • पांचवी अनुसूची = धारा 16 के अंतर्गत अन्य रूपों में मनाए जाने वाला विवाह का प्रमाण पत्र।

 धारा | Section

 धारा /Section 1 – अधिनियम को लागू करना।

 धारा /Section 2– इसमें विवाह के लिए दो व्यक्तियों के संबंध का उल्लेख है, जिसमें किसी प्रकार के रक्त संबंध, गोद लेने संबंधी संबंधों में विवाह का नहीं करना शामिल है।

 धारा/Section 3– विवाह अधिकारी का उल्लेख है जिसे पूरे राज्य या एक जिले के लिए विवाह अधिकारी नियुक्त किया गया है।

 धारा/Section 4– सभी दस्तावेज के पुष्टिकर दोनों पक्षों के बीच विवाह संपन्न कराया जाता है। कहा जा सकता है कि इस सेक्शन 4 ऑफ स्पेशल मैरिज एक्ट के तहत लव मैरिज  कराए जाते हैं।

धारा/Section 5–  विवाह के इच्छुक वर-वधू जिले के विवाह अधिकारी को अनुसूची दो के अनुसार लिखित रूप से सूचना देंगे, जिसमें 30 दिनों के समय का उल्लेख रहेगा।

धारा/Section 6 – धारा 5 के तहत प्राप्त जानकारी को विवाह अधिकारी द्वारा कार्यालय के सूचना पटल के साथ सभी क्षेत्रीय समाचार पत्र में प्रकाशित करवाया जाएगा।

धारा/Section 7 – नोटिस प्रकाशन के 30 दिन के अंदर विवाह के लिए किसी को आपत्ति हो, तो व्यक्ति इसकी सूचना कर सकता है। 

धारा/Section 8 – धारा 7 के तहत यदि किसी व्यक्ति द्वारा किया गया आपत्ति वैध हो, तो विवाह अधिकारी द्वारा विवाह नहीं कराया जाएगा। 

धारा/Section 9 – धारा 8 के तहत प्राप्त आपत्ति के संबंध में विवाह अधिकारियों  के पास जांच के लिए गवाह और सबूत की पड़ताल और पूछताछ की शक्ति होगी।

धारा/Section 10- धारा 7 के तहत विदेश या जम्मू कश्मीर से प्राप्त आपत्ति पर  विवाह अधिकारी का प्रतिक्रिया।

धारा/Section 11 – अनुसूची 3 के अनुसार उल्लेखित विवाह के पक्षकार, तीन गवाह, विवाह अधिकारी उपस्थिति में विवाह संपन्न होगा।

धारा/Section 12– विवाह संस्कार  संपन्न कराए जाने के लिए विवाह कार्यालय के अलावा अन्य स्थल का चयन।

धारा/Section 13– यदि विवाह संपन्न हो गया हो तो चौथी अनुसूची के अनुसार विवाह का प्रमाण पत्र प्रदान किया जाएगा।

धारा/Section 14– तय दिनांक पर यदि किसी कारणवश शादी नहीं हो पाई, तब नया नोटिस जारी होगा।

धारा/Section 15– किसी भी रूप में किये गए विवाह का पंजीकरण।

धारा/Section 16– विवाह के रजिस्ट्रेशन की सारी प्रक्रिया का उल्लेख।

धारा/Section 17– यदि विवाह अधिकारी किसी कारणवश विवाह कराने से इनकार के आदेश दे तो इस आदेश के खिलाफ जिला न्यायालय में अपील किया जा सकता है। 

धारा/Section 18- विवाह के पंजीकरण का प्रभाव अर्थात लव मैरिज करने वाले के संतान वैध माने जाएंगे।

धारा/Section 19– संयुक्त परिवार के सदस्यों पर प्रभाव का उल्लेख। 

धारा/Section 20– इस अधिनियम के तहत विवाह करने वालो के पास समान अधिकार के अंतर्गत संपत्ति का उत्तराधिकार हो सकता है।

धारा/Section 21 –  विवाहित पक्षों का एक दूसरे के संपत्ति पर अधिकार। 21(A) – कुछ मामलों में विशेष प्रावधान।

धारा/Section 22– दाम्पत्य वैवाहिक अधिकारों की बहाली के लिए जिला अदालत में याचिका लगा सकते हैं।

धारा/Section 23– न्याय पृथक्करण  याचिका दायर का उल्लेख।

धारा/Section 24– धारा 4 के तहत कराए गए विवाह के शर्तों को पूरा नहीं करने की स्थिति में  इस विवाह को शून्य करार दिया जाएगा।

धारा/Section 25– शून्य विवाह होने के स्थिति में  विवाह अमान्य करार करने के उल्लेख।

धारा/Section 26– शून्य विवाह के अंतर्गत होने वाले बच्चों को वैध माना जाएगा।

धारा/Section 27-तलाक के प्रावधानों  का उल्लेख। 27(A) तलाक की कार्यवाही ।

धारा/Section 28– आपसी सहमति से तलाक।

धारा/Section 29– विवाह के बाद  शुरू के 1 वर्ष तक तलाक की याचिका पर प्रतिबंध का उल्लेख।

धारा/Section 30– तलाकशुदा व्यक्तियों का पुनर्विवाह।

धारा/Section 31 – तलाक के लिए किस न्यायालय में याचिका दायर की जानी चाहिए उसका उल्लेख।

धारा/Section 32– याचिका में कही गई बातों और सामग्री का सत्यापन कार्य।

धारा/Section 33– विवाह से संबंधित प्रत्येक कार्यवाही कैमरे के अंतर्गत संचालित की जाएगी। 

धारा/Section 34– तलाक की याचिका पर न्यायालय द्वारा सुलह का पहल।

धारा/Section 35– तलाक के लिए याचिकाकर्ता द्वारा प्रतिवादी से किए गए दावे पर राहत।

धारा/Section 36– पत्नी को दिए जाने वाले गुजारा भत्ता संबंधी उल्लेख। 

धारा/Section 37– स्थाई गुजारा भत्ता और रखरखाव का वर्णन।

धारा/Section 38– तलाक के बाद बच्चों के शिक्षा और रखरखाव के संबंध में।

धारा/Section 39– अदालत की किसी भी कार्यवाही पर अपील करने का अधिकार।

धारा/Section 40– भारतीय दंड संहिता 1908 के अधिनियम 5 को लागू करना। 

धारा/Section 41 – उच्च न्यायालय के पास नियम को विनियमित करने की शक्ति।

धारा/Section 42– इस अधिनियम के द्वारा कराया गया जाने वाले विवाह अन्य विवाह को प्रभावित नहीं करेगा।

धारा/Section 43– इस अधिनियम के तहत विवाहित व्यक्ति द्वारा दोबारा विवाह करने पर दंड दिया जाएगा।

धारा/Section 44– दूसरे विवाह के सजा का प्रावधान।

धारा/Section 45– झूठी घोषणा या प्रमाण पत्र पर हस्ताक्षर करने के लिए दंड का उल्लेख।

धारा/Section 46– यदि विवाह के दौरान विवाह अधिकारी द्वारा कोई नियम का उल्लंघन किया जाता है तो उसकी सजा।

धारा/Section 47– विवाह प्रमाण पत्र पुस्तिका हमेशा खुली रहेगी।

धारा/Section 48– विवाह संबंधित सभी दस्तावेज के प्रतियों का 

धारा/Section 49– विवाह पंजीकरण की प्रति रजिस्टार जनरल तक जाएगा।

धारा/Section 50– विवाह के लिए प्रस्तुत किए जाने वाले दस्तावेज में अगर त्रुटि हो तो उस पर सुधार।

धारा/Section 51– इस अधिनियम के तहत नियम बनाने की शक्ति केंद्र सरकार के पास  होगी।

               लव मैरिज एक्ट में पेरेंट्स अगेंस्ट किसी धारा का उल्लेख नहीं है। यदि पेरेंट्स चाहे तो, सेक्शन 4 के तहत कराए जाने वाले विवाह के लिए विवाह अधिकारी कार्यालय द्वारा मांगी गई आपत्ति में वर या वधू के पक्ष में कोई जानकारी को धोखाधड़ी की स्थिति में प्रस्तुत कर सकते हैं।

 भारत में मैरिज के अन्य एक्ट

             भारत में शादी करने के लिए स्पेशल मैरिज एक्ट 1954 के अलावा हिंदू मैरिज एक्ट 1955, आर्य समाज मैरिज वैलिडेशन 1937 और मुस्लिम मैरिज एक्ट   1939 शामिल है।

 हिंदू मैरिज एक्ट 1955 –

     18 मई 1955 को लागू होने वाले इस अधिनियम के तहत कोई भी हिंदू पुरुष व महिला विवाह कर सकते हैं। दो विवाह अमान्य होने के साथ दण्डनीय भी है। न्यायिक तलाक के आधार पर ही दूसरे विवाह को मान्यता दी गई है, जिसमें अव्यस्क बच्चों का भरण पोषण भी शामिल है।

 मुस्लिम मैरिज एक्ट 1939 –

       मुस्लिम समाज में शादी यानि निकाह  स्त्री और पुरुष के बीच सहमति स्वीकृति का आधार है। मुस्लिम विवाह कानून के तहत एक स्त्री का पहले पति से तलाक लेने के उपरांत दूसरा निकाह मान्य होगा, जबकि एक पुरुष का एक साथ चार पत्नियां के साथ भी विवाह मान्य है।

 आर्य मैरिज वैलिडेशन एक्ट 1937

      आर्य समाज हिंदू धर्म का ही एक प्रमुख अंग है, इस समाज के सारे नियम हिंदू मैरिज एक्ट के तहत ही है। आर्य समाज हिंदू वैष्णव, जैन और बौद्ध धर्म को शादी की स्वीकृति देता है।  मुस्लिम और ईसाई धर्म के लोग यहां शादी नहीं कर सकते हैं।

 स्पेशल मैरिज एक्ट 1954 vs हिंदू मैरिज एक्ट 1955

 अगर आप लव मैरिज के सरकारी नियम को अच्छे से समझना चाहते हैं, तो आपको इन दोनों अधिनियम के अंतर को समझना होगा :

1. स्पेशल मैरिज एक्ट (SMA) 1954 अधिनियमित किया गया, हिंदू विवाह अधिनियम (HMA)1955 में अधिनियमित किया गया ।

2.  SMA किसी भी जाति,  धर्म के लोगों पर लागू होता है, जो भारत का नागरिक हो, वो चाहे अन्य देश के नागरिक से भी शादी कर सकता है। HMA केवल हिंदू धर्म पर लागू होता है,  जो भारत के निवासी हैं।

3. SMA विवाह अधिकारी द्वारा लव मैरिज के सरकारी नियम के तहत विवाह कराया जाता है। शादी पूर्व दोनों पक्षों को विवाह अधिकारी को सूचना देना पड़ता है। HMA पहले से किए गए शादी के लिए रजिस्ट्रेशन का अवसर देता है। नागरिक कहीं भी कभी भी शादी करके उसका रजिस्ट्रेशन समय सीमा के भीतर करा सकता है।

4. SMA विवाह बिना रजिस्ट्रेशन के संपन्न नहीं हो सकता है। HMA विवाह का रजिस्ट्रेशन ऑप्शनल है यानि रजिस्ट्रेशन कराना अनिवार्य नहीं है।

5. SMA शादी के लिए कोई पारंपरिक रीति-रिवाज और संस्कार की आवश्यकता नहीं होती है। HMA अधिकांश विवाह परंपरा व रीति रिवाज के साथ संपन्न होते हैं।

 कोर्ट में अब तक कितने लव मैरिज रजिस्ट्रर हुए हैं –  

        भारत में प्रत्येक वर्ष अंतर्जातीय  लव मैरिज करने वालों की संख्या में इजाफा हुआ है। एक रिपोर्ट के अनुसार पिछले 10 सालों दिन में दिल्ली, मुंबई, पुणे कोलकाता जैसे महानगरों में लगभग 8 से 9 लाख लव मैरिज रजिस्टर हुए हैं।  इस आधार पर आंकलन करें तो पिछले 10 सालों में पूरे भारत में लगभग 32 से 35 लाख लोगों द्वारा लव मैरिज करने का अनुमान है।

 लव मैरिज के सरकारी नियम

       अगर आप लव मैरिज करना चाह रहे हैं, तो ऊपर लेख में हमने इस स्पेशल मैरिज एक्ट 1954 के सभी धाराओं के बारे में बताया है, जिससे आपको  अंतर्जातीय विवाह करने के लिए सभी कानूनी प्रावधानो का पता  चल जाएगा। इसके बाद ही आप लव मैरिज के सरकारी नियम को सरल रूप से जानना चाहते हैं, तो आप आगे भी लेख में हमारे साथ बने रहिए, यहां हम कोर्ट में लव मैरिज कैसे करें, इसके बारे में बता रहे हैं : –

 कोर्ट में लव मैरिज के लिए जरूरी शर्तें :

1. वर वधु दोनों पक्ष सुनिश्चित करें कि दोनों का पहले विवाह ना हुआ हो और यदि हुआ हो तो तलाकशुदा या फिर तो साथी के मृत होने का प्रमाण।

2. अपने पारिवारिक रिश्ते में शादी को मान्यता नहीं होगी। पूर्वजों से या निजी रूप से खून के रिश्ते होने पर विवाह नहीं होगा।

3. दोनों पक्ष सरकारी दस्तावेज के अनुसार बालिक हो और मानसिक रूप से स्टेबल हो।

 कोर्ट में लव मैरिज के लिए प्रक्रिया :

1. दोनों पक्ष द्वारा विवाह अधिकारी को सूचना दिया जाएगा। सूचना की तारीख 30 दिन तक किसी एक को उसी शहर में निवास करना होगा।

2. विवाह अधिकारी द्वारा प्राप्त सूचना को दोनों पक्ष के स्थाई निवास क्षेत्र के समाचार पत्र और अपने कार्यालय में प्रकाशित किया जाएगा।

3. प्रकाशित सूचना पर दोनों पक्षों के पास या दूर के रिश्तेदार आपत्ति दर्ज करा सकते हैं। आपत्ति की जांच विवाह अधिकारी को करने पड़ेंगे।

4. आपत्ति वैध होगी, तो विवाह नहीं होगा। यदि जांच उपरांत तो आपत्ति अवैध होगी, तो विवाह तय दिनांक को संपन्न में किया जाएगा।

 कोर्ट में लव मैरिज के लिए आवश्यक दस्तावेज :

  •  सूचना आवेदन पत्र और निर्धारित शुल्क
  •  वर वधु के चार पासपोर्ट फोटो
  •  आधार कार्ड /पहचान प्रमाण पत्र
  • जन्म प्रमाण पत्र /10वीं की मार्कशीक 
  •  शपथ पत्र विवाह के संबंध में
  • यदि पूर्व विवाह हो,तो उसे संबंधित दस्तावेज
  •  दोनों पक्ष की ओर से 3 गवाह हस्ताक्षर

 क्या 1 दिन में कोर्ट मैरिज कर सकते हैं?

      जी नहीं! कोर्ट मैरिज की सारी प्रक्रिया पूर्ण होने के लिए कम से कम 36 दिन का समय लगता है। उसके बाद कोर्ट में लव मैरिज सरकारी नियम के अनुसार कराया जाता है।

         तो दोस्तों आज के इस “कुछ सीखें” के लेख में हमने आपको लव मैरिज  के सरकारी नियम के बारे में  बताने के साथ स्पेशल मैरिज एक्ट 1954 के बारे में विस्तार से चर्चा की है। उम्मीद है हमारा यह लेख आपके लिए बहुत फायदेमंद होगा। यदि लेख आपको पसंद आया तो कमेंट बॉक्स में अपनी राय जरूर लिखें।

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1 Comment

ट्विंस प्रेगनेंसी डाइट - कुछ सीखे · 01/08/2022 at 11:13 am

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